अपक्षय किसे कहते हैं

अपक्षय क्या है? चट्टानों के अपने ही स्थान पर भौतिक रासायनिक एवं जैविक क्रियाओं द्वारा टूटने फूटने की क्रिया को अपक्षय कहते हैंl अपक्षय किसे कहते हैं? अपक्षय ताप, वायु तथा प्राणियों का कार्य है जिनके द्वारा यांत्रिक तथा रासायनिक परिवर्तनों से चट्टानों में अपने स्थान पर ही टूट-फूट होती रहती है इसे ही अपक्षय कहते हैंl

अपक्षय के प्रकार

1 ) यांत्रिक या भौतिक अपक्षय

सूर्यताप, तुषार तथा वायु द्वारा चट्टानों में विघटन होने की क्रिया को ‘यांत्रिक अपक्षय’ कहां जाता हैl यांत्रिक अपक्षय में यद्यपि ताप का परिवर्तन सर्वाधिक प्रभावशाली कारक हैl

( i ) ताप के कारण चट्टानों का बड़े-बड़े टुकड़ों में विघटन –

तापीय परिवर्तन का चट्टानों पर अत्यधिक प्रभाव होता है कुछ ऐसे चट्टाने हैं जिन पर तापीय परिवर्तन का प्रभाव नहीं होता है चट्टान चूर्ण से निर्मित चट्टानों खासकर शेल ( shale ) तथा बालूकापत्थर पर तापीय अंतर का प्रभाव नगण्य होता है इनमें चट्टानों के कण  एक दूसरे से अम्लीय तथा क्षारीय पदार्थ की पतली सतह द्वारा अलग रहते हैंl जिस कारण ताप का प्रभाव नहीं हो पाता है इसके विपरीत रवेदार चट्टानों में विभिन्न कण एक दूसरे से संगठित होते हैं तथा ताप के बढ़ने से प्रत्येक कन फैलता है तथा तापीय ह्रास के साथ उनमें सिकुड़न होती है तापीय परिवर्तन द्वारा चट्टानों का फैलाव तथा संकुचन द्वारा विघटन कार्य उष्ण मरुस्थलीय प्रदेशों में अधिक संपन्न होता हैl जिसके कारण चट्टानों में तनाव या खिंचाव की स्थिति पैदा हो जाती है इस क्रमिक फैलाव एवं संकुचन के कारण चट्टानों में समानांतर जोड़ या संधियों का विकास हो जाता है इस क्रिया के सहारे चट्टाने बड़े-बड़े टुकड़ों में टूटने लगती है इस क्रिया को बड़े-बड़े टुकड़ों में विघटन की क्रिया कहते हैंl

( ii ) वर्षा के जल द्वारा चट्टानों का टूट टूट कर बिखरना

गर्म प्रदेशों में जहां पर ताप अधिक होता है, इस क्रिया का संपादन अधिक होता है तप्त चट्टानों के ऊपर जब अचानक जल के छींटे पड़ती है तो उनमें चटकने आ जाती है आ जाती है चट्टानों की ये चटकने जल के साथ मिली ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड गैसों के रासायनिक प्रभाव के कारण हुई हैl इतना तो निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि सूर्यताप द्वारा तप्त चट्टानों के ऊपर जब अचानक वर्षा कीफुहारे पडती है तो उनमें शीघ्रता से चटकने पड़ जाती है तथा चट्टानें छोटे-छोटे कणों में टूट कर बिखरने लगती है संयुक्त राज्य अमेरिका के टेक्सास प्रांत में इस क्रिया के कारण चट्टानों का बिखरना सामान्य घटना हैl

( iii ) तुषार कणों द्वारा बड़े-बड़े टुकड़ों में विघटन

तुषार द्वारा यांत्रिक अपक्षय के अंतर्गत चट्टानों के बड़े-बड़े टुकड़ों में विघटन शीतोष्ण तथा शीत कटिबंधीय भागों में अधिक प्रचलित होता हैl इसके अलावा ऊंचे पर्वतों के ऊपरी भाग पर भी यह क्रिया अधिक सक्रिय होती हैl तुषार पात की क्रिया का संपादन दो रूपों में होता है प्रथम तो चट्टानों के कणों के अंदर स्थित जल के जमने तथा पिघलने से तथा दूसरे चट्टानों की दराजो में स्थित जल के द्वारा चट्टान के संगठन का प्रभाव इस प्रकार के यांत्रिक अपक्षय पर अधिक होता है प्रथम प्रकार के विघटन में चट्टानों के कणों के अंदर जल समाविष्ट होता है रात के समय यह जल जमकर बर्फ बन जाता है तथा दिन में पिघल कर तरल हो जाता है इस क्रिया के पुनरावृति के कारण चट्टान विशेष के कणों में दबाव तथा तनाव होने से चट्टान का छोटे-छोटे कणों में विघटन प्रारंभ हो जाता है

इसके विपरीत दूसरी क्रिया के अंतर्गत चट्टानों के अंदर छोटे-छोटे चित्र तथा दराज होते हैं जिनमें जल एकत्र हो जाता है दिन के समय जल का समावेश इन रिक्त स्थानों में हो जाता है तथा रात के समय ताप में कमी होने तथा उसके हिमांक बिंदु के प्राप्त हो जाने के बाद रिक्त स्थानों में स्थित जल जमकर बर्फ के रूप में ठोस हो जाता है जिस कारण इसके आयतन में 10% का विस्तार हो जाता है जिस कारण चट्टानों के बड़े-बड़े टुकड़े टूट कर अलग होने लगते हैंl

( iv ) वायु तथा ताप द्वारा आपदलन

रेगिस्तानी, अर्द्ध- रेगिस्तानी तथा मानसूनी प्रदेशों में ताप तथा वायु के सम्मिलित कार्य के द्वारा चट्टानों की परतों से सकेंद्रीय परत अथवा क्षैतिज परतो का बिलगाव होता रहता है इसे अपदलन या परतों का उखड़ना कहते हैंl यह क्रिया प्राय: रवेदार चट्टानों में अधिक घटित होती है उष्ण रेगिस्तानी भागों में तापीय विभिन्नता के कारण अर्थात रात के कम ताप के कारण चट्टानों में संकुचन तथा दिन में अधिक ताप के कारण फैलाव होने से चट्टानों की उपरी चट्टानों की ऊपरी परत ढीली पड़ जाती है जिस कारण शैल – चादर अलग हो जाती है वेगवान वायु के संपर्क में आने से ढीली परते चट्टानों से अलग होती रहती है इस प्रकार चट्टान क्रमशः धीरे-धीरे नग्न होती जाती हैl

( v ) दाबमुक्त द्वारा विघटन

कई आग्नेय तथा रूपांतरित चट्टानें पृथ्वी के अंदर अन्य चट्टानों के नीचे दबी रहती है जिस कारण उच्च दबाव एवं ताप के कारण उनमें कणों की संरचना होती है परंतु ऊपर की चट्टानों का जब अपरदण द्वारा लोप हो जाता है तो दबी चट्टाने ऊपर दृष्टिगत होती है फलस्वरूप उनमें दबाव हट जाती है इस कारण चट्टानों में दरारें पड़ जाती है तथा विघटन आरंभ हो जाता हैl

2 ) रासायनिक अपक्षय

वायुमंडल के निचले स्तरों में ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा जलवाष्प की अधिकता होती है वायुमंडल में जल की उपस्थिति से इनकी क्रियाशीलता में वृद्धि हो जाती है तथा यह सक्रिय घोलक हो जाते हैं एवं अनेक रासायनिक क्रियाओं के द्वारा शैलों का अपक्षय होने लगता है ये विभिन्न क्रियाएं निम्नलिखित हैl

( i ) ऑक्सीकरण वायु की ऑक्सीजन जल की उपस्थिति में खनिजों से क्रिया करती हैl इस कारण खनिजों में ऑक्साइड बन जाते हैंl जिससे चट्टानों में वियोजन होने लगता है जिस चट्टानों में लोहे  के योगिक अधिक होते हैंl उनमें ऑक्सीकरण का प्रभाव सर्वाधिक होता है एवं लोहे के योगिक फैरस अवस्था से फैरिक अवस्था में बदल जाते हैं आग्नेय चट्टानों में लौह और लौह सल्फाइट तथा पाइराइट के रूप में पाया जाता है अतः इन पर ऑक्सीकरण के प्रारंभ से जंग लग जाती है गर्म जलवायु वाले भागों में ऑक्सीजन अधिक सक्रिय रहती है जिस कारण रासायनिक परिवर्तन के कारण वहाँ पर मिट्टियों का रंग लाल, पीला या भूरा हो जाता है पायराइट पर जल और ऑक्सीजन की क्रिया से गंधक का अम्ल उत्पन्न होता हैl जो कि शैलो को गलाने में सहायक सिद्ध होता हैl

( ii ) कार्बोनेशन

साधारण जल कैल्शियम कार्बोनेट तथा मैग्नीशियम कार्बोनेट की शैलों को नहीं घोल पाता परंतु वायुमंडल की कार्बन डाइऑक्साइड जल में घुलकर कार्बनिक अम्ल बनती है जिनमें खुलकर कार्बोनेट घुलनशील बाइकार्बोनेटो में परिवर्तित हो जाते हैं और इस प्रकार चूने का पत्थर, संगमरमर तथा जिप्सम आदि जल में घुल जाते हैं जब लोहे के सल्फाइड तकिया पायराइट पर कार्बन डाइऑक्साइड से युक्त जल का प्रभाव होता है तो उसके क्रमशः लोहे के कार्बोनेट तथा सल्फ्यूरिक अम्ल बन जाते हैं लोहे का कार्बोनेट जल में घुलनशील होने के कारण घुलकर शीघ्रता से चट्टानों से अलग हो जाता हैl

( iii ) जलयोजन

जब खनिज पदार्थ जल से रासायनिक क्रिया करके नवीन योगिक का निर्माण कर लेते हैं तो यह क्रिया हाइड्रेशन कहलाती हैl इस क्रिया द्वारा चट्टाने जल सोख लेती है तथा उनके आयतन में वृद्धि हो जाती है इस प्रकार चट्टानों के आयतन में विस्तार के कारण उनके कणों तथा खनिजों में तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है जिस कारण चट्टाने फ़ैलकर टूटने लगती हैl फेल्सपार खनिज हाइड्रेशन की क्रिया द्वारा कओलिन मृतिका में परिवर्तित हो जाती हैl

( iv ) सिलिका पृथक्करण

बहते जल द्वारा ग्रेनाइट का सिलिका कट कट कर पृथक हो जाता हैl अधिक सिलिका के निकल जाने से शैल शीघ्र ही विघटित हो जाती है क्योंकि अधिक सिलिकायुक्त चट्टाने अपक्षय की प्रतिरोधी होती है सिलिका जब क्वार्टर के रूप में होता है तो बहुत कडा होता है परतदार शैलो में यदि क्वाटर्ज हो तो वह आग्नेय शैलो से भी कठोर हो जाती है परंतु सिलिका के पृथक होने से यह शैले भी विघटित हो जाती हैl

3 ) जैविक अपक्षय

वनस्पतियां, जीव- जंतु तथा मनुष्य भी चट्टानों के विघटन तथा वियोजन में सहयोग प्रदान करते हैं पृथ्वी की ऊपरी सतह में मृदा के रहने वाले कीड़े –  मकोड़े, बिल बनाने वाले जंतु आदि मृदा को खोद खोद कर उसे कमजोर बनाते रहते हैं जिससे चट्टाने दुर्बल होकर विखंडित हो जाती हैl वनस्पतियां भी दो प्रकार के अपक्षय की प्रक्रिया में सहयोग प्रदान करती है यांत्रिका अपक्षय द्वारा तथा रासायनिक अपक्षय द्वारा यात्रीक अपक्षय में वृक्षों की जड़े पृथ्वी के अंदर प्रवेश कर चट्टानों के संधियों एवं दरारों को चौड़ा कर उनके विखंडन में सहयोग करती है वहीं दूसरी ओर वृक्षो तथा पौधों की जड़ों से निकलने वाले अम्ल रासायनिक अपक्षय में सहयोग करते हैं वनस्पतियों तथा जीवो के अवशेष जल में पडकर सडते हैं जिस कारण उनसे कार्बन डाइऑक्साइड ऑर्गेनिक एसिड आदि अलग हो जाते हैं तथा इनके सम्मिश्रण से जल एक सक्रिय घोलक कारक हो जाता है तथा चट्टानों के खनिजों का अलग कर लेता है

मनुष्य भी अपनी क्रियाओं द्वारा चट्टानों के विघटन एवं वियोजन में सक्रिय योगदान कर अपक्षय का महत्वपूर्ण कारक बन गया हैl

 

 

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