पर्वत निर्माण के सिध्दांत

भू-तल का वह भाग जो निकटवर्ती प्रदेश से एक दम ऊंचा होता चला गया हो तथा जिसका ऊपरी भाग बहुत कम विस्तार वाला हो किंतु जिसके तिरछे ढाल बहुत विस्तीर्ण हो पर्वत कहलाता हैl उत्पत्ति के आधार पर पर्वतों को वली पर्वत, भ्रंश पर्वत तथा ज्वालामुखी पर्वत आदि में रखा जाता हैl इन सभी पर्वतों में मोडदार पर्वत जिनका निर्माण परतदार चट्टानों से हुआ है तथा जिनका मौलिक विन्यास भू- संचलन के कारण काफी विरुपित हो गया है तथा जिनमें विस्तृत क्षेत्र में वलन बिभंग तथा परिवलन के प्रमाण मिलते हैं तथा जिनकी लंबाई कई हजार की. मी. तक पाई जाती है की उत्पत्ति की व्याख्या करना एक जटिल कार्य रहा है इनकी उत्पत्ति एवं स्थिति की व्याख्या करने के लिए भू वैज्ञानिकों ने समय-समय पर सिद्धांतों का प्रतिपादन किया हैl

पर्वत किसे कहते है

कोबर का भू-सन्नति सिद्धांत

प्रसिद्ध जर्मन विद्वान को कोबर ने वलित पर्वतों की उत्पत्ति की व्याख्या के लिए भूसन्नति सिद्धांत का प्रतिपादन 1925 में किया वास्तव में उनका प्रमुख उद्देश्य प्राचीन दृढ भूखंडों तथा भुसन्तियों में संबंध स्थापित करना थाl कोबर ने इस तरह अपने भूसन्नति सिद्धांत के आधार पर पर्वत निर्माण की क्रिया को समझाने का भरकस प्रयास किया है इनका सिद्धांत संकुचन शक्ति पर आधारित है

पृथ्वी में संकुचन होने से उत्पन्न बल से अग्रदेशों में गति उत्पन्न होती है, जिस से प्रेरित होकर सम्पिद्नात्मक बल के कारण भूसन्नति का मलबा वलित होकर पर्वत का रूप धारण करता है जहां पर आज पर्वत है, वहां पर पहले भूसन्नतियां थी इन भूसन्नतियों के चारों ओर प्राचीन दृढ़ भूखंड थे जिन्हें क्रेटोजेन ( अग्रदेश ) बताया है लंबे काल में नदियां इन दृढ़ खंडों का अपरदन करके तलछट को पास स्थित भू अभिनति में जमा करती रहती है.

इस क्रिया को अवसादीकरण कहां जाता है भू अभिनति में अवसादो के निरंतर जमा होने से उनके भार में वृद्धि हो जाती है जिससे उनकी तली में धासंव होने लगता है इस क्रिया को अवतलन कहते हैं इस प्रकार भू अभिनति अत्याधिक गहरी होती जाती है जब भू अभिनति से उत्पन्न क्षतिज संचलन के कारण भू अभिनति के दोनों अग्र देश एक दूसरे की ओर खिसकने लगते हैं जिससे भू अभिनति के अवसादो पर सम्पिद्नात्मक बल पड़ता है जिससे अवसादो में मोड उत्पन्न हो जाता है एवं वली पर्वतों का निर्माण हो जाता है इस प्रक्रिया में भू अभिनति के दोनों किनारों पर दो पर्वत श्रेणियों का निर्माण होता है जिन्हें को कोबर ने  रेडकेटन का नाम दिया है

कोबर के अनुसार भू अभिनति का केवल आंशिक भाग वलित होगा या संपूर्ण भू अभिनति में वलय उत्पन्न होगा यह संपीडन बल की तीव्रता पर निर्भर करता है यदि संपीड़न का बल सामान्य होता है तो केवल किनारे वाले भाग ही वलित होते हैं तथा मध्यवर्ती भाग वलन से अप्रभावित रहता है इसे कोबरने स्वाशिनवर्ग कहां है जिससे सामान्य रूप में मध्य पिंड कहां जाता है

कोबर के अनुसार टेथिस सागर भू अभिनति के उत्तर में यूरोप का स्थल भाग तथा दक्षिण में अफ़्रीका का दृढ़ भूखंड था इन दोनों अग्र प्रदेशों के एक दूसरे की ओर खिसकने से पेरेनिज, आल्पस, कार्पेथियंस, बाल्कन, काकेशस आदि पर्वतों का निर्माण हुआl

 

 

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