वायु द्वारा निर्मित स्थलाकृति ( पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति )

वायु द्वारा निर्मित स्थलाकृति – अपरदन के अन्य कारकों के समान पवन भी अपरदन तथा निक्षेपन का एक प्रमुख कारक है परंतु हिमानी या सरिता ओं के परिवहन कार्य से पवन का कार्य सर्वथा भिन्न होता है पवन की प्रवाह की दिशा में विभिन्नता तथा अनिश्चितता के कारण उसका  परिवहन भी किसी भी रूप में किसी भी दिशा में हो सकता है. अर्ध्द शुष्क तथा शुष्क मरुस्थलीय भागों में पवन अपरदण का एक सक्रिय कारक होती है पृथ्वी के समस्त क्षेत्रफल का लगभग एक तिहाई भाग मरुस्थलीय है. वायु अपरदण तथा निक्षेप क्रिया द्वारा विभिन्न प्रकार की भू आकृतियों का निर्माण करती है.

वायु द्वारा अपरदनात्मक कार्य –

पवन का अपरदन संबंधी कार्य प्रमुख रूप से भौतिक या यांत्रिक रूपों में ही संपादित होता है मरुस्थलों में रासायनिक कार्य कुछ सीमा तक अल्पकालीन सरिता ओं तथा वर्षा के जल द्वारा होता है वर्षा द्वारा भी यांत्रिक अपरदन ही अधिक होता है मरुस्थली भागों में अपरदन का कार्य अपक्षय से अधिक प्रभावित होता है शुष्क मरुस्थलों में यांत्रिक अपक्षय के कारण चट्टानों के विघटन हो जाने से चट्टानें ढीली पड़ जाती है इन असंगठित चट्टानों को पवन आसानी से अपरदित कर देती है पवन द्वारा अपरदन का कार्य तीन रूपों में होता है.

i ) अपवाहन ( Deflation ) : – अपवाहन के अंतर्गत पवन चट्टान चूर्ण उड़ाकर अपरदन का कार्य करती है अपवाहन को इसलिए उड़ान की क्रिया भी कहते हैं यांत्रिक अपक्षय के कारण ढीले तथा असंगठित चट्टानों के ढीले कनो को पवन चट्टानों से अलग करके उड़ा ले जाती है इस तरह चट्टानों की परत दर परत उडाव की क्रिया द्वारा टूटती रहती है तथा आधार शैला नग्न हो जाती है इस नग्न चट्टान पर स्थान- स्थान पर छोटे-छोटे छिद्र व गर्त बन जाती है मिस्र देश में अपवाहन या उड़ाव के कारण अनेक गहरी गर्त बन गई है इसमें से कतरा गर्त उल्लेखनीय है यह सागर तल से 420 फीट ( 333 M. )गहरी है.

ii ) अपघर्षण ( abrasion or corrasion ) : – जब तीव्र वेग से बहती हुई पवन से के साथ रेत तथा धूल कणों की मात्रा पर्याप्त होती है तो ये कन पवन के अपरदनात्मक यंत्र हो जाते हैं इस अपरदनात्मक यंत्र की सहायता से पवन मार्ग में पड़ने वाली चट्टानों को रगड़ कर घिस कर तथा चिकना करके अपरदित करती है पवन का अपघर्षण कार्य पवन वेग तथा रेत कणों की मात्रा पर आधारित होता है अपघर्षण का कार्य सतह से थोड़ी ऊंचाई पर परंतु 6 फीट से नीचे ही अधिक सक्रिय होती है न तो सतह पर अपघर्षण हो पाता है न अधिक ऊंचाई पर.

iii ) संनिघर्षण ( attrition ) :- तीव्र पवन के साथ उड़ने वाले शैलकण तथा घुलीकन मार्ग में पड़ने वाली चट्टानों को रगड़ने तथा घिसने के अलावा स्वयं आपस में टकराकर रगड़ खाकर  टूटते फूटते रहते है इस कारण कणों का आकार छोटा तथा गोल होने लगता है अधिक रगड़ होने के कारण कण बारिश हो जाते हैं इस तरह शैल कणों के आपस में रगड़ खाकर यांत्रिक ढंग से टूटने की क्रिया को संघर्षण कहते हैं.

पवन के अपरदन कार्य द्वारा निर्मित स्थलाकृति – ( वायु द्वारा निर्मित स्थलाकृति )

वायु द्वारा निर्मित स्थलाकृति

1 ) वातगर्त  ( Blow – outs )

सतह के ऊपर असंगठित तथा कोमल शैलों को पवन अपने अपवाहन या उड़ाव की क्रिया से प्रभावित करके उनके ढीले कनों को उड़ा ले जाती है जिस कारण अनेक छोटे-छोटे गर्तो का आविर्भाव होता है शनै: शनै: इन गर्तो का आकार तथा गहराई दोनों बढ़ती जाती है परंतु इन गर्तों की गहराई की अंतिम सीमा भौम जल स्तर द्वारा निर्धारित की जाती है इन गर्तों का निर्माण पवन द्वारा होता है अतः इन्हें पवन गर्त या वातगर्त भी कहते हैं सहारा के रेगिस्तान, कालाहारी, मंगोलिया तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी शुष्क भागों में पवन द्वारा निर्मित अनेक गर्तों के उदाहरण पाए जाते हैं.

2 ) छत्रक शिला – गारा :-

ऊपरी उठी चट्टानों का सबसे अधिक अपरदन धरातल से कुछ ही ऊपर होता है क्योंकि यहां हवा में बालू के कणों की मात्रा अधिक होती है और धरातल से घर्षण भी नहीं होता है पवन द्वारा चट्टानों के निचले भाग में अत्याधिक अपघर्षण द्वारा उसका आधार कटने लगता है जबकि उसका ऊपरी भाग अप्रभावित रहता है यदि पवन कई दिशाओं से चलती रही तो चट्टान का निचला भाग चारों तरफ से कट जाने के कारण पतला हो जाता है इस तरह एक छतरी नुमा स्थलरूप का निर्माण होता है जिसे छत्रक शिला कहते हैं

वायु द्वारा निर्मित स्थलाकृति

3 )  इन्सेलबर्ग ( insellberg ) :-

जिसका तात्पर्य पर्वत, द्वीप या द्वीपीय पर्वत होता है. वास्तव में विस्तृत रेगिस्तानी क्षेत्र में कठोर चट्टान के सामान्य सतह से ऊंचे ऊंचे टीले इस तरह लगते हैं मानो सागर स्थित द्वीप हो. मरुस्थलों में मानो अपक्षय तथा अपरदन के कारण कोमल शैल आसानी से कट जाती है परंतु कठोर शैल के अवशेष भाग ऊंचे ऊंचे टीलों के रूप में बच जाते हैं इस तरह के टीलों या टापुओं को इन्सेलबर्ग कहा जाता है इन्सेलबर्ग के पार्श्व ( किनारे ) तिरछे ढाल वाले होते हैं. डेविस ने कालाहारी रेगिस्तान में स्थित इन्सेलबर्ग तथा समीपी सतह के अध्ययन के आधार पर यह बताया की इन्सेलबर्ग से युक्त समतल भाग मरुस्थली अपरदन चक्र का अंतिम रूप है.

4 ) यारदंग :-

यारदंग की रचना ज्यूजेन के विपरीत होती है. जब कोमल तथा कठोर चट्टानों के स्तर लंबवत दिशा में मिलते है तो पवन कठोर शैल की अपेक्षा मुलायम शैल को शीघ्र अपरदित करके उड़ा ले जाती है इस प्रकार कठोर शैलों के मध्य कोमल शैलों के अपरदित होकर  उड़ जाने के कारण कठोर चट्टानों के भाग खड़े रहते रह जाते हैं इन शैलों के पार्श्व में पवन द्वारा कटाव होने से नालियां बन जाती है इस तरह के स्थलरूप को यारदंग कहते हैं यारदंग प्राय: पवन की दिशा में समांतर रूप में होती है उनकी ऊंचाई 20 फीट तक तथा चौड़ाई 30 से 120 फीट तक होती है यारदंग का निर्माण निश्चित रूप से पवन के अपघर्षण कार्य द्वारा होता है.

5 ) भू- स्तंभ ( Demoiselles ) :-

मरुस्थलीय प्रदेशों में जब मुलायम शैल के ऊपर कठोर शैल खंड स्थित होती है तो वह अपने नीचे की मुलायम शैल को अपरदन से बचाती है तथा निकटवर्ती मुलायम शैल के अपरदन के उपरांत एक स्तंभ के रूप में अवशिष्ट रह जाती है इसी को भू-स्तंभ कहते हैं मंगोलिया, तुर्किस्तान, इराक, अरब, पेरू के मरुस्थलो में अनेक भू- स्तंभ मिलते हैं.

6 ) ज्यूजेन ( zeugen ) :-

मरुस्थली भाग में यदि कठोर तथा कोमल शैलों की परतें ऊपर निचे एक दुसरे के समानांतर होती है तो अपक्षय तथा वायु द्वारा अपरदन के कारण विचित्र प्रकार के स्थलरुपों का निर्माण हो जाता है जो ढक्कनदार दावात के समान होते है अर्थात उनका ऊपरी भाग कम चोडा तथा निचला भाग अधिक चौड़ा होता है परंतु इन स्थलरूपों के उपरी भाग पर कठोर शैल का आवरण होता है तथा इनका ऊपरी भाग समतल होता है ऐसे स्थलरूपों को ज्यूजेन कहा जाता है.

7 ) त्रिकोणक ( Driekenter ) :- 

मरुस्थलीय प्रदेशों में बालू से लदी हुई हवा धरती पर बिखरे हुए चट्टान टुकड़ों पर प्रहार करती है जिससे वे घिसकर चिकने हो जाते हैं ये चट्टान ऐसे प्रतीत होती है जैसे किसी मिस्त्री ने उसे छेनी से काट छांट कर और घिसकर रख दिया हो. इन पत्थरों के ऊपरी तल चिकने और कई पहल वाले होते हैं अधिकतर ये टुकड़े लंबे, दोनों सिरों पर नुकीले और तीन पहल वाले होते हैं अपूर्व चमक के कारण ये बड़े ही सुंदर प्रतीत होते हैं ऐसे चट्टानी टुकड़ों को त्रिकोणक कहते हैं यह सहारा मरुस्थल में अधिक पाए जाते हैं.

8 ) पुल तथा खिड़की :-

शक्तिशाली पवन के निरंतर अपघर्षण से शैलों में खोखले बन जाते हैं जो धीरे-धीरे चौड़े होते जाते हैं. इस प्रकार बने खोखलो को पवन खिड़कियां कहां जाता है ये खोखले अपघर्षण और अपवाहन की क्रिया द्वारा और अधिक जोड़ें हो जाते हैं और इस प्रकार एक मेहराब प्रकार की आकृति जिसकी छत बनी रहती है बन जाती है. इस प्रकार बनी आकृति को खिड़की सेतू कहां जाता है इस प्रकार के विलक्षण उदाहरण लूत मरुस्थल, तकला मकान, सहारा एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के एरिजोना मरुस्थल में है दक्षिणी युटा का रेनबो ब्रिज 70 मीटर विस्तृत के साथ 95 मीटर तक एक भव्य मेहराब है.

वायु द्वारा निर्मित स्थलाकृति

पवन का निक्षेपण कार्य ( वायु द्वारा निर्मित स्थलाकृति ) :- 

पवन का निक्षेपण कार्य अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इस कार्य द्वारा बालुका स्तूपो तथा लोयस जैसे महत्वपूर्ण स्थलों का निर्माण होता है पवन का निक्षेप कई बातों पर आधारित होता है तीव्र वेग से चलने वाली पवन की परिवहन सामर्थ्य अधिक होने से उसके साथ अधिक मात्रा में पदार्थों का परिवहन होता है जैसे ही पवन के वेग में कमी आ जाती है उसकी परिवहन सामर्थ्य घट जाती है जिस कारण अतिरिक्त पदार्थ नीचे बैठने लगते हैं इसके अलावा निक्षेपण के लिए पवन मार्ग में अवरोध का होना आवश्यक होता है पवन मार्ग में अवरोध वनों, झाड़ियां, दलदलों, नदियों जलाशयों तथा दीवानों आदि से उपस्थित हो जाते हैं इन अवरोधों के कारण पवन का वेग कम हो जाने से पदार्थों का विभिन्न रूपों में निक्षेप होने लगता है निक्षेप जनित स्थल रूपों में बालूका स्तूप सर्वाधिक महत्वपूर्ण है.

 

 

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